सुकून-ओ-चैन क्या पता किधर चले गए- भरत मल्होत्रा


सुकून-ओ-चैन क्या पता किधर चले गए, 
अपनों की दुआओं से भी असर चले गए, 
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खुद फरिश्तों को भी नाज़ होता था जिन पे, 
कौन सी दुनिया में वो बशर चले गए, 
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सड़क के बीचों-बीच मैं तड़पता ही रहा 
सारे लोग अपने - अपने घर चले गए,
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कहते थे जो कि साथ निभाएंगे उम्र भर, 
इधर चले गए तो कुछ ऊधर चले गए,
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मुसलसल सी तीरगी है ज़िंदगी में तेरे बाद, 
तेरे साथ मेरे शाम और सहर चले गए,
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उदास हैं अब गांव के सब साएदार पेड़,
छाँव  में  बैठते  थे  जो शहर चले गए,


भरत मल्होत्रा