राष्ट्रीय युवा दिवस पर शोभा यात्रा का आयोजन ।


 मड़ियाहूं : राष्ट्रीय युवा दिवस और स्वामी विवेकानन्द जी  की जयंती के अवसर पर मड़ियाहूं पी जी कॉलेज एवम अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद मछलीशहर, काशी प्रांत के संयुक्त तत्वावधान में पी जी कॉलेज से गांधी तिराहा तक शोभा यात्रा का आयोजन किया गया। इस शोभा यात्रा का शुभारंभ महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ एस के पाठक ने किया। उन्होंने कहा कि युवा  राष्ट्र  के कर्णधार हैं और सम्पूर्ण राष्ट्र की नजर उनकी तरफ हैं ऐसे में युवाओं को अपना दायित्व निभाना होगा। इस अवसर पर विद्यार्थी परिषद के प्रांत उपाध्यक्ष डॉ मनोज शुक्ल, नगर अध्यक्ष डॉ विशेष श्रीवास्तव, जिला प्रमुख डॉ त्रिपुरारी उपाध्याय, नगर विस्तारक श्री मनीष जी,  मोकलपुर नगर अध्यक्ष श्री महेश दुबे, महाविद्यालय के वरिष्ठ आचार्य डॉ. अजय वर्मा, डॉ आंजनेय पांडेय, डॉ बृजेश शुक्ल, स्वदेशी जागरण मंच जौनपुर काशी प्रांत के विचार एवम संपर्क प्रमुख डॉ विवेक कुमार मिश्र समेत महाविद्यालय के पाँच सौ से अधिक छात्र छात्राओं ने इस शोभा यात्रा में सहभागिता की। इस अवसर पर मछलीशहर के सांसद श्री बी पी सरोज, प्राचार्य श्री एस के पाठक एवम प्रांत उपाध्यक्ष डॉ मनोज शुक्ल ने महाविद्यालय में स्थित पंडित राजकिशोर तिवारी की प्रतिमा का माल्यार्पण किया और शोभा यात्रा का नेतृत्व किया।

                       


बतादें की स्वामी विवेकानन्द का जन्म 12 जनवरी सन् 1863 (विद्वानों के अनुसार मकर संक्रान्ति संवत् 1920) को कलकत्ता में एक कुलीन कायस्थ परिवार में हुआ था। उनके बचपन का घर का नाम वीरेश्वर रखा गया, किन्तु उनका औपचारिक नाम नरेन्द्रनाथ दत्त था। पिता विश्वनाथ दत्त कलकत्ता हाईकोर्ट के एक प्रसिद्ध वकील थे। दुर्गाचरण दत्ता, (नरेंद्र के दादा) संस्कृत और फ़ारसी के विद्वान थे उन्होंने अपने परिवार को २५ वर्ष की आयु में छोड़ दिया और एक साधु बन गए।उनकी माता भुवनेश्वरी देवी धार्मिक विचारों की महिला थीं।उनका अधिकांश समय भगवान शिव की पूजा-अर्चना में व्यतीत होता था। नरेन्द्र के पिता और उनकी माँ के धार्मिक, प्रगतिशील व तर्कसंगत रवैया ने उनकी सोच और व्यक्तित्व को आकार देने में सहायता की !

                                              विवेकानन्द का योगदान तथा महत्व

तीस वर्ष की आयु में स्वामी विवेकानन्द ने शिकागो, अमेरिका के विश्व धर्म सम्मेलन में हिंदू धर्म का प्रतिनिधित्व किया और उसे सार्वभौमिक पहचान दिलवायी। गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने एक बार कहा था-"यदि आप भारत को जानना चाहते हैं तो विवेकानन्द को पढ़िये। उनमें आप सब कुछ सकारात्मक ही पायेंगे, नकारात्मक कुछ भी नहीं।"


रोमां रोलां ने उनके बारे में कहा था-"उनके द्वितीय होने की कल्पना करना भी असम्भव है, वे जहाँ भी गये, सर्वप्रथम ही रहे। हर कोई उनमें अपने नेता का दिग्दर्शन करता था। वे ईश्वर के प्रतिनिधि थे और सब पर प्रभुत्व प्राप्त कर लेना ही उनकी विशिष्टता थी। हिमालय प्रदेश में एक बार एक अनजान यात्री उन्हें देख ठिठक कर रुक गया और आश्चर्यपूर्वक चिल्ला उठा-‘शिव!’ यह ऐसा हुआ मानो उस व्यक्ति के आराध्य देव ने अपना नाम उनके माथे पर लिख दिया हो।"


वे केवल सन्त ही नहीं, एक महान देशभक्त, वक्ता, विचारक, लेखक और मानव-प्रेमी भी थे। अमेरिका से लौटकर उन्होंने देशवासियों का आह्वान करते हुए कहा था-"नया भारत निकल पड़े मोची की दुकान से, भड़भूँजे के भाड़ से, कारखाने से, हाट से, बाजार से; निकल पडे झाड़ियों, जंगलों, पहाड़ों, पर्वतों से।" और जनता ने स्वामी की पुकार का उत्तर दिया। वह गर्व के साथ निकल पड़ी। महात्मा गान्धी को आजादी की लड़ाई में जो जन-समर्थन मिला, वह विवेकानन्द के आह्वान का ही फल था। इस प्रकार वे भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के भी एक प्रमुख प्रेरणा के स्रोत बने। उनका विश्वास था कि पवित्र भारतवर्ष धर्म एवं दर्शन की पुण्यभूमि है। यहीं बड़े-बड़े महात्माओं व ऋषियों का जन्म हुआ, यही संन्यास एवं त्याग की भूमि है तथा यहीं-केवल यहीं-आदिकाल से लेकर आज तक मनुष्य के लिये जीवन के सर्वोच्च आदर्श एवं मुक्ति का द्वार खुला हुआ है। उनके कथन-"‘उठो, जागो, स्वयं जागकर औरों को जगाओ। अपने नर-जन्म को सफल करो और तब तक नहीं रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाये।"

उन्नीसवीं सदी के आखिरी वर्षोँ में विवेकानन्द लगभग सशस्त्र या हिंसक क्रान्ति के जरिये भी देश को आजाद करना चाहते थे। परन्तु उन्हें जल्द ही यह विश्वास हो गया था कि परिस्थितियाँ उन इरादों के लिये अभी परिपक्व नहीं हैं। इसके बाद ही विवेकानन्द ने ‘एकला चलो‘ की नीति का पालन करते हुए एक परिव्राजक के रूप में भारत और दुनिया को खंगाल डाला।

                          उन्होंने कहा था कि मुझे बहुत से युवा संन्यासी चाहिये जो भारत के ग्रामों में फैलकर देशवासियों की सेवा में खप जायें। उनका यह सपना पूरा नहीं हुआ। विवेकानन्द पुरोहितवाद, धार्मिक आडम्बरों, कठमुल्लापन और रूढ़ियों के सख्त खिलाफ थे। उन्होंने धर्म को मनुष्य की सेवा के केन्द्र में रखकर ही आध्यात्मिक चिंतन किया था। उनका हिन्दू धर्म अटपटा, लिजलिजा और वायवीय नहीं था।

स्वामी विवेकानंद के अनमोल वचनो में उठो जागो और तब तक नहीं रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त नहीं हो जाता प्रमुख है